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बोलीभाषाएँ लोकजीवन के लोकमानस का संचित रुप है। बोलीभाषाओंका साहित्य लोकसमुदायमें अनुभूतियोंका प्रतिबिम्ब है। भारत में विभिन्न बोलीभाषाएँ बोली जाती है। उनमें खानदेश की अहिराणी बोली का स्वतंत्र रुप है। अहिराणी अतिप्राचीन बोली है। उसके संदर्भ में इ.स. पूर्व 250 वर्ष पहले मिलते है। मागधी, सौराष्ट्री, शौरसेनी, पैशाची प्राकृत आदि प्राचीन भारतीय भाषाोंसे अहिरानी का उद्भव के प्रमाण तत्कालीन, शिलालेखों, ताम्रप्रटोंमें मिलता है।
अभिरोंकी या अहिरों की अहिराणी बोली भाषा है। अभीरोंका उल्लेख महाभारत में मिलता है। चौथी शति में नासिक खानदेश प्रदेशपर अभिरोंका राज्य था। इसका प्रमाण मिलता है। सदियों से महाराष्ट्र में मराठी, कोकणी, कानडी, फारसी, अरबी, वर्हाडी, हिन्दी, अंग्रजी, आदि भाषाओं के संपर्कमें आनेपर भी अहिराणी का मौलिक-मौखिक रुप आज भी सुरक्षित है। प्रस्तुत पुस्तक में विस्तारपूर्वक अहिराणी लोकसाहित्य का परिचय पाठकको हो सकता है। अहिराणी बोली भाषा के अध्ययन-अध्यापन कर्ताओंके लिए ये पुस्तक उपयुक्त सिद्ध होगी।