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यह पुस्तक केवल तथ्यों और कवियों की जीवनी का संकलन नहीं है| यह उन महान आत्माओं के विचारों, उनकी भावनाओं और उनके क्रांतिकारी संदेशों को समझने का एक विनम्र प्रयास है| कबीर ने जहाँ सामाजिक कुरीतियों पर तीखे प्रहार किए, वहीं तुलसीदास ने मर्यादा और आदर्श की स्थापना की| सूरदास ने बालकृष्ण की लीलाओं का ऐसा वर्णन किया कि उनकी भक्ति रस की धारा आज भी बह रही है, और मीराबाई का प्रेम अपने आप में एक साधना बन गया|
तुकाराम जी की अभंग गाथा तथा संत नामदेव की मुखावानी ने भी इस भक्ति परंपरा को अत्युच्च सीमा तक पहुचाया| इन महान कवियों ने केवल हिंदी साहित्य को ही नहीं बल्कि पुरे समाज में एकता और समरसता को बढ़ावा दिया| इनके रचे हुए पद दोहे गेय काव्य आज भी हर भारतीय समाज में संगीतात्मक रूप में गाये जाते है|
इस पुस्तक के माध्यम से मेरा उद्देश्य भक्ति काव्य की विभिन्न धाराओं-सगुण और निर्गुण-को एक साथ प्रस्तुत करना है| हम देखेंगे कि कैसे इन कवियों ने अपनी-अपनी शैली में एक ही परम सत्ता की आराधना की| यह यात्रा हमें न केवल साहित्य की गहराई में ले जाएगी, बल्कि उस समय के समाज, संस्कृति और लोक-जीवन को भी समझने में मदद करेगी| भारत के इतिहास में तब एक ऐसा समय जब भारतीय लोग परकीयों के वश में होकर गुलामी में पड गए थे| उन दिनों उन्हें केवल परमात्मा ही सहारा था | उसी के आधार पर इन तत्कालीन महात्माओं ने समाज में नया चैतन्य डाल कर पुनरुत्थान किया था अत: आज का समय भी ठीक वैसा ही है पाश्चात्य परम्परा की ओर बढ़ता रुख, पारिवारिक संघर्ष, शहरीकरण, वैश्वीकरण और पश्चिमीकरण इसलिए हमे इन महात्माओं का चरित्र पढ़ना चाहिए जिससे हमें स्फूर्ति मिले जीने की नई उर्जा मिले तथा उचित मार्ग दिखला सकते है | संत कबीरदास जी कहते है - कबीर संगत साधू की, नित प्रति कीजै जाय| दुरमति दूर बहावसी, देशी सुमति बताय | अर्थात साधू की संगति रोज करनी चाहिए | यह तुम्हारी दुर्बुद्धि (बुरी सोच) को दूर बहा देगी और तुम्हे अच्छी बुद्धि प्रदान करेगी| इस पुस्तक के माध्यम से आपको साधू-संतो की संगति का ही अनुभव प्राप्त होगा |
मुझे आशा है कि, यह पुस्तक पाठकों को भक्ति काल के स्वर्ण युग से परिचित कराएगी और उन्हें उस आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति कराएगी जो इन महान कवियों की रचनाओं में छिपा हुआ है| यह पुस्तक उन सभी जिज्ञासुओं को समर्पित है जो जानना चाहते हैं कि कैसे भक्ति ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया और भारतीय संस्कृति में अमिट छाप छोड़ी| भारत की साहित्यिक परंपरा में भक्ति काव्य का एक विशेष और महत्वपूर्ण स्थान है| यह सिर्फ एक काव्य-धारा नहीं, बल्कि एक सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आंदोलन भी था जिसने मध्यकाल में भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया| भक्ति काल को हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग माना जाता है, और यह उपाधि इसे इसकी अद्वितीय साहित्यिक और वैचारिक समृद्धि के कारण मिली है|
भक्ति की अवधारणा कोई नई नहीं थी, इसका उद्गम प्राचीन उपनिषदों और गीता में मिलता है| लेकिन, 7 वीं शताब्दी में दक्षिण भारत के अलवार और नयनार संतों ने इसे एक जन-आंदोलन का रूप दिया| उनके द्वारा गाए गए ईश्वर प्रेम के गीत, जो तमिल भाषा में थे, ने भक्ति के संदेश को लोक-भाषा के माध्यम से फैलाने का मार्ग प्रशस्त किया| धीरे-धीरे, यह धारा उत्तर की ओर बढ़ी और 13वीं शताब्दी तक इसने उत्तरी भारत को अपनी गिरफ्त में ले लिया| इस काल में कई महान संत और कवि उभरे, जिन्होंने ईश्वर के प्रति निःस्वार्थ प्रेम और समर्पण को अपनी कविताओं का केंद्र बनाया| उन्होंने धार्मिक कर्मकांडों, जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानताओं का खुलकर विरोध किया| उन्होंने माना कि ईश्वर को पाने का मार्ग मंदिर या मस्जिद में नहीं, बल्कि अपने हृदय में स्थित है| इस विचार ने एक ऐसी क्रांति को जन्म दिया, जिसने समाज को आध्यात्मिक रूप से सशक्त बनाया|