{"product_id":"१९८०-के-बाद-हिंदी-साहित्य","title":"१९८० के बाद हिंदी साहित्य","description":"\u003cp\u003e२१ वी सदी में ग्रामीण और आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों पर दृष्टिपात करते हुए आज की सदी में ग्रामीण और आदिवासियों का चिंतन आवश्यक है। स्वातंत्र्यपूर्व काल आज तक कई साहित्यकारों ने अपनी कलम चलाई है। विशेष रूप में उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का समग्र साहित्य ग्राम जीवन के विविध अंगोंसे परिपूर्ण है। डॉ. रामदरश मिश्र और डॉ. विवेकी राय के ग्राम जीवन के सच्चे चितेरे है। १९८० बाद भी मिथिलेश्वर, मैत्रेयी पुष्पा, चित्रा मुदगल, मार्कण्डेय, लक्ष्मीनारायण लाल, गोविंद मिश्र, संजीव, केदारनाथ सिंह, महाश्वेतादेवी, फणेश्वरनाथ रेणु, कृष्णा सोबती, नागार्जुन, डॉ. शिवप्रसाद सिंह, राही मासूम रझा, विद्यासागर नौटियाल, मधुकर सिंह, शेखर जोशी, मोहनदास नैमिशराय, ओमप्रकाश वाल्मिकी, सरिता बडाइक, मलखान सिंह, अरूण कमल, लीलाधर जगूडी, लीलाधर मंडलोई आदि रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में जीवंत ग्राम जीवन साकार किया है।\u003cbr\u003e१९८० के बाद भारतीय ग्राम जीवन में आये बदलावों और उनकी चुनौतियों को अभिव्यक्त करनेवाले हिन्दी साहित्य का विचार-विमर्श करने का प्रयास किया गया है। ग्रामीण जीवन को लेकर जो अहं सवाल और समस्याएँ हमारे समक्ष खडे है, उन समस्याओं पर और सवालों पर हिन्दी साहित्यकारों ने किस हद तक लेखनी उठाई है उसे जानने का प्रयास भी किया गया है। इसके साथ-साथ ग्रामीण जनजीवन, कथावस्तु, पात्र, भाषा, प्रतिक, उद्देश्य, संस्कृति में भी जो बदलाव आये है उन्हें भी उजागर करने का प्रयास हुआ है।\u003c\/p\u003e","brand":"Prashant Publication","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48769601077477,"sku":null,"price":395.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0802\/8563\/0693\/files\/1980KeBadHindiSahitya_ProfDevidasBamane-1.jpg?v=1775807330","url":"https:\/\/prashantpublications.com\/products\/%e0%a5%a7%e0%a5%af%e0%a5%ae%e0%a5%a6-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af","provider":"My Store","version":"1.0","type":"link"}