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‘हिन्दी साहित्य और फिल्मांतरण’ (Hindi Literature and Film Adaptation) कला जगत का एक बेहद समृद्ध और खूबसूरत विषय है| जब किसी साहित्यिक कृति (उपन्यास, कहानी या नाटक) को सिनेमा के पर्दे पर दृश्य-श्रव्य रूप में ढाला जाता है, तो उसे ‘फिल्मांतरण’ कहते हैं| एक भाषा अध्येयता के रूप में यह विषय वैचारिक और रचनात्मक दोनों दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण है| इस विषय के मुख्य पहलुओं को हम निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझ सकते हैं :
1. शब्द से दृश्य का सफर (From Word to Visual) चुनौती और सृजन : साहित्य में लेखक शब्दों से पाठक के मन में कल्पना जगाता है| फिल्मांतरण में निर्देशक को उन शब्दों को कैमरा, रोशनी, अभिनय और संगीत के जरिए स्क्रीन पर साक्षात दिखाना होता है| परिवर्तन : फिल्म की समय-सीमा (2-3 घंटे) तय होती है, इसलिए कई बार लंबी कहानियों के कुछ हिस्सों को काटना पड़ता है या सिनेमाई जरूरत के हिसाब से बदलाव करना पड़ता है|
2. हिन्दी साहित्य के कुछ ऐतिहासिक फिल्मांतरण (Key Examples) हिन्दी सिनेमा के इतिहास में कई कालजयी रचनाओं पर बेहतरीन फिल्में बनी हैं : गोदान (मुंशी प्रेमचंद) : प्रेमचंद के इस महान उपन्यास पर इसी नाम से फिल्म बनी, जिसने भारतीय ग्रामीण जीवन और किसानों के दर्द को पर्दे पर जीवंत किया| तीसरी कसम (फणीश्वरनाथ रेणु) : रेणु जी की प्रसिद्ध कहानी ’मारे गए गुलफाम’ पर बनी यह फिल्म हिन्दी सिनेमा की सबसे कलात्मक और भावुक फिल्मों में गिनी जाती है| पिंजर (अमृता प्रीतम) : विभाजन की त्रासदी और महिलाओं के दर्द पर लिखे गए इस उपन्यास पर बनी फिल्म ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता| रजनीगंधा (मन्नू भंडारी) : मन्नू भंडारी की कहानी ’यही सच है’ पर बासु चटर्जी ने यह बेहद खूबसूरत और यथार्थवादी फिल्म बनाई| शतरंज के खिलाड़ी (मुंशी प्रेमचंद) : महान निर्देशक सत्यजीत रे ने प्रेमचंद की इस कहानी पर नवाबों के पतन और अंग्रेजों के आगमन की पृष्ठभूमि पर अद्भुत फिल्म बनाई|
3. आधुनिक दौर में फिल्मांतरण (The Modern Era& OTT) आज के दौर में भी साहित्य का फिल्मांतरण बंद नहीं हुआ है, बल्कि इसका रूप बदला है : ओमकारा, मकबूल, हैदर (विशाल भारद्वाज) : इन्होंने शेक्सपियर के नाटकों का
भारतीयकरण करके (जैसे ‘ओथेलो’ को यूपी की पृष्ठभूमि पर ‘ओमकारा’ बनाया) अद्भुत सिनेमा रचा| वेब सीरीज (OTT) : आज के समय में विस्तृत उपन्यासों को 2 घंटे की फिल्म के बजाय 8-10 एपिसोड की वेब सीरीज में ढालना ज्यादा आसान हो गया है (जैसे ‘सेक्रेड गेम्स’ या अन्य साहित्यिक कृतियाँ)|
4. फिल्मांतरण का महत्व और विवाद, साहित्य का विस्तार : कई बार जो लोग किताबें नहीं पढ़ते, वे फिल्मों के जरिए महान लेखकों और उनकी कहानियों से परिचित होते हैं| इससे साहित्य आम जनता तक पहुंचता है| आत्मा से समझौता? अक्सर यह विवाद होता है कि क्या फिल्म, मूल किताब के साथ न्याय कर पाई? कई बार निर्देशक अपने व्यावसायिक लाभ के लिए कहानी की मूल आत्मा या संदेश को बदल देते हैं, जिससे साहित्य प्रेमी आहत होते हैं| पुस्तक का मूल उद्द्येश्य पाठकों को हिंदी साहित्य और सिनेमा के अंत संबंधों से परिचित कराना साथ ही हिंदी उपन्यासों पर आधारित फिल्मों से अवगत कराना है| सिनेमा बच्चों से लेकर बूढ़ों तक रुचि और आकर्षण का विषय है| बच्चे युवा तथा बूढ़े घंटों बैठकर सिनेमा देख सकते हैं| अगर इन बच्चों या युवाओं को इसी क्षेत्र में रोजी रोटी मिले तो अधिक बेहतर होगा| वर्तमान युग में हम जानते हैं कि विदेशी फिल्म (हॉलीवुड) देशी फिल्म (बॉलीवुड) तथा दक्षिणी फिल्म (टॉलीवुड) आजकल उभरी है| भारतभर में फिल्म को केंद्र में रखकर विचार-विमर्श हो रहा है| इस फिल्म जगत में फिल्मांतरण हिंदी उपन्यासों तथा कहानियों पर आधारित फिल्म, लघु फिल्म, डॉक्यूमेंट्री फिल्म, वेब सीरीज, डबिंग, संवाद लेखन, गीत लेखन, डायरेक्टर, सह डायरेक्टर, कैमरामैन, मेकअप मैन, डिजाइनर, संगीतकार जैसे से कई रोजगार के क्षेत्र खुले हैं|