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सुगम काव्यशास्त्र
Rs.250.00काव्यशास्त्र की सुदीर्घ परम्परा है। इसका इतिहास लगभग दो हजार वर्षों में फैला हुआ है। ईसा पूर्व दूसरी-तीसरी शताब्दी से लेकर सत्रहवीं शताब्दी तक भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्रीय चिंतन की परंपरा पल्लवित और विकसित होती रही। जीवन का प्रवाह अनन्त है। अनादि काल से आज तक मानव जीवन के इस अनन्त प्रवाह ने अपने भाव और बुद्धि प्रवाह की असीमितता को मापने-जोखने के लिए अनवरत अध्यवसायपूर्ण कर्म के माध्यम से अनेक प्रकार के घाट निर्मित किए है। शास्त्र, साहित्य, कला, ज्ञान, विज्ञान कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है कि जिसे मानव के भाव और बुद्धि से संचालित कर्म ने अपने स्पर्श द्वारा अलौकिक एवं उपयोगी न बना दिया हो।
प्रस्तुत ग्रंथ में चिंतन की इस सुदीर्घ परम्परा के प्राय: सभी महत्वपूर्ण मोडों को समेटने का प्रामाणिक प्रयास किया गया है। साथ ही भारतीय तथा पाश्चात्य काव्यशास्त्र के महान आचार्यो से लेकर बीसवी शताब्दी के आलोचकों के प्रमुख काव्य-सिद्धांतों का विवेचन-विश्लेषण किया गया है। नि:संदेह यह ग्रंथ छात्रोपयोगी बनाने की दिशा में तथा जिज्ञासु छात्रों को दृष्टिगत रखते हुए लिखा गया है।
Sugam Kavyashastra
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सुजाण नागरिकत्व
Rs.275.00प्रस्तुत पुस्तकात सखोल व सविस्तर माहितीचे विश्लेषण करण्याचा प्रयत्न केला आहे. नागरिकत्वाचा अर्थ नागरीकांची कर्तव्ये व जबाबदाऱ्या, भारताच्या संदर्भात नागरिकत्वाची संकल्पना, नागरिकत्व कायदा व या कायद्यात वेळोवेळी करण्यात आलेल्या दुरुस्त्या, सामाजिक न्यायाच्या व सर्वसमावेशकतेच्या समस्यांच्या अनुषंगाने लैंगिक समानता, वांशिक विविधता व समतामूलक समाजाला प्रोत्साहन, डिजिटल आव्हानाच्या रुपात ऑनलाईन गोपनियता, डिजिटल अधिकार व सोशल मिडिया नागरी सहभागावर परिणाम, पर्यावरणीय आव्हानांच्या रूपात हवामान बदल, शाश्वत विकास व याबाबत नागरीकांच्या जबाबदाऱ्या, राजकीय सहभागाचे व दुष्प्रचारांच्या आव्हानात्मक रूपात मतदार दडपशाही, मतदारांचे ध्रृवीकरण जागरूक व नागरिक निर्माण करण्यात नागरी शिक्षणाची भूमिका, खोट्या बातम्या प्रचार व डिजिटल हेराफेरीचा जागरूक व जबाबदार नागरिक निर्माण करण्यावर परिणाम यासंबंधात सविस्तर व सोप्या भाषेत मांडणी व विश्लेषण करण्यात आले आहे.